ऑनरेरी पी-एच.डी. का खुला रहस्य

ऑनरेरी पी-एच.डी. का खुला रहस्य

रामपुर पहुँचते ही मैं अभी अपनी बड़ी दीदीजी के ड्राइंगरूम में बैठा ही था कि वह मुझसे बोलीं, “पता है, तुम्हारे जीजाजी ने भी तो पी-एच.डी. कर ली है। अब वह भी तुम्हारी तरह से अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाते हैं।” फिर तुरंत ही ड्राइंगरूम की वॉल पर लगे एक ‘फ्रेमयुक्त सर्टिफिकेट’ की ओर इशारा करते हुए उन्होंने उसे देखने हेतु मुझसे कहा, “देखो, यह है उनका सर्टिफिकेट।” मैं तुरंत ही सोफे से उठकर उस ‘फ्रेमयुक्त सर्टिफिकेट’ को गंभीरता से देखने लगा, क्योंकि मुझे पता था कि हमारे जीजाजी ने तो अपने जमाने में बड़ी मुश्किल से केवल ग्रैजुएशन ही कर पाई थी। वे पोस्टग्रैजुएट नहीं थे। फिर बिना पोस्टग्रैजुएशन किए हुए आज सीधे ही पी-एच.डी.। मेरे दिमाग में प्रश्नचिह्न‍ था, अतः मेरे शोधी एवं खोजी दिमाग में पत्रकारिता जाग उठी। जीजाजी का मामला था तो क्या हुआ, अंदर-ही-अंदर मेरा दिल और दिमाग बड़ी सी रहस्यमयी जाँच-पड़ताल में जुट गया। मैंने पाया कि उनका उक्त सर्टिफिकेट किसी विश्वविद्यालय का नहीं था बल्कि कनाडा की एक पी-एच.डी. गाइडेंस फाउंडेशन नामक निजी संस्था का था और जिस पर जीजाजी के नाम के आगे ‘ऑनरेरी पी-एच.डी.’ लिखा हुआ था।

अब मुझे सारा मामला समझते देर न लगी, लेकिन इससे पहले मैं दीदीजी से कुछ कह पाता, मुझे बड़ों के आगे अधिक न बोलने के जड़ संस्कार ने रोक दिया। मैं स्वयं अपने मुँह पर चुपचाप रहने की उँगली रखते हुए पुनः सोफे पर आकर वापस बैठा ही था कि आदरणीय दीदीजी ने चाय-नाश्ता कराने से पहले हमारे प्रिय जीजीजी की एक फोटो अलबम हमारे हाथ में देते हुए कहा, “लो, यह देखो तुम्हारे जीजाजी के कॉन्वोकेशन की फोटो हैं, पहले इसे देख लो। पता है, उनका यह कॉन्वोकेशन कनाडा से दिल्ली आकर स्वयं ही अध्यक्ष महोदय और अन्य गण्यमान्य व्यक्तियों और साथ में देखो, भारत की ब्यूटी क्वीन के मध्य हुआ। देखो भारत की ब्यूटी क्वीन तुम्हारे अति प्यारे सुंदर-सलोने जीजाजी के साथ और भी सुंदर लग रही है न!”

मैंने फोटो में देखा कि हमारे प्रिय जीजाजी को मेरी नजर में एक साधारण सा प्रिंटिड रंगीन-पत्र, जो उनके लिए बहुमूल्य सर्टिफिकेट था, वह दिल्ली के एक पाँच सितारा होटल के रंगीन रोशनी के मध्य जगमगाते हुए विशाल सभागार में कॉन्वोकेशन ओवरकोट जैसा ओवरकोट और कैप लगाकर मिला था और उस दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति और कुलसचिव पर उक्त कनाडियन फाउंडेशन/संस्थान के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष मौजूद थे। वे भी पूरी तरह से सुसज्जित रंगीन कॉन्वोकेशन ओवरकोट और कैप में थे। हमारे आदरणीय प्रिय जीजाजी को तो बस इस समारोह की गरिमामयी उपस्थिति में पधारने से पहले और उपाधि प्रमाण-पत्र प्राप्ति के लिए संबंधित फाउंडेशन/संस्थान के अकाउंट में भारतीय होने के नाम पर उन्हें मिली तीस हजार रुपयों की विशेष छूट के बाद केवल सत्तर हजार नौ सौ निन्यानबे रुपए जमा करने पड़े थे। जिसमें नौ सौ निन्यानबे रुपए उस ओवरकोट और कैप थे, जो हमारे जीजाजी को कॉन्वोकेशन के दिन फाउंडेशन/संस्थान द्वारा पहनने हेतु उधार दिया गया था।

यह सब देखकर और जानकर हमने गहरी साँस ली और हिम्मत करके अपनी ज्यादा पराई नहीं, यानी अपनी सगी उम्र में बड़ी दीदी से कहा, “दीदी, जिसे आप जीजाजी की डिग्री मान रही हैं, वह वास्तव में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमानुसार और प्रक्रियानुरूप शैक्षिक योग्यता के आधार पर मिलनेवाली मूल ‘डॉक्टरेट’ की उपाधि नहीं है। केवल एक ऐसा सर्टिफिकेट मात्र है, जो किसी भी व्यक्ति को उसके उत्कृष्ट कार्यों के संबंध में या समाज में बेहतरीन विशेष योगदान के लिए ‘ऑनरेरी डिग्री यानी मानद उपाधि’ के रूप में दिया जाता है। ये तो बस एक प्रकार का सम्मान होता है और इस प्रकार के सम्मान को कभी भी किसी विश्वविद्यालय से परीक्षा उपरांत प्राप्त पी-एच.डी. डिग्री की तरह से मूल स्थाई मान्यता नहीं दी जा सकती। सच कहूँ तो ऑनरेरी डिग्री यानी मानद उपाधि पानेवाले लोग अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ शब्द भी नहीं लगा सकते, क्योंकि शैक्षिक योग्यता के आधार पर वे ‘डॉक्टरेट’ होते ही नहीं हैं।”

मैंने अपने सामने रखी टेबल पर रखे पानी भरे गिलास का पूरा पानी पीकर फिर आगे कहा, “दीदी, मेरे प्रिय आदरणीय जीजाजी को उनकी शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय योगदान के लिए उन्हें यह ‘ऑनरेरी डिग्री यानी मानद उपाधि’ दी गई है। यह उपाधि भी उन्हें इसलिए दी गई है, क्योंकि अपनी स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में उनका अतुलनीय योगदान रहा। वे खुद १०वीं में तीन बार, १२वीं में दो बार और फिर आर्ट ग्रैजुएशन में एक बार फेल हुए, लेकिन उन्होंने अपनी योग्यता हासिल करने में भारतीय मकड़ी से प्रेरणा लेकर कभी हार नहीं मानी। इसलिए कनाडियन फाउंडेशन/संस्थान उन्हें यह प्रमाण-पत्र देकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा है और साथ ही मेरे सीधे-सादे और बेचारे इन विदेशियों की चालाकी भरी बातों की समझ न रखनेवाले नासमझ प्यारे जीजाजी से पूरे सत्तर हजार नौ सौ निन्यानबे रुपए ऐंठकर खुद ऐश कर रहा है। केवल मानद उपाधि के नाम पर साधारण लोगों को ठगने का धंधा कोई इनसे सीखे।” तभी कॉलबेल बजती है और मेरी आदरणीय बड़ी दीदीजी का मुझसे ऑर्डर स्वरूप कहना था कि लगता है, तुम्हारे जीजाजी आ गए हैं। चलो, उनके तुरंत पैर छूना और उन्हें मुसकराते हुए बधाई भी देना। उनके सामने अपनी भारतीय यू.जी.सी. मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से की हुई पी-एच.डी. मत झाड़ने लगना बस। दीदी दरवाजा खोलती हैं और मैं अपने भोले-भाले आदरणीय प्यारे जीजाजी को देखकर तुरंत भारतीय सभ्यतानुसार अपनी बड़ी दीदीजी की आज्ञा का पालन करता हूँ और फिर अपने मुँह को जीजाजी के सामने अत्यधिक स्पष्ट रूप से न खुलने के लिए एक अदृश्य, यानी गुप्त लॉक लगाने के गुप्त प्रयास में जुट जाता हूँ।

आलोक सक्सेना
जे.डी.-१८-ई/सी, तृतीय मंजिल,

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