मलयाली कहानी

मलयाली कहानी

उण्णिकृष्‍णन मनक्कल: सुपरिचित लेखक अनुवादक। ‘पंतिरूकुलत्तिंटे अम्मा’ (बारह कुलों की माता) उपन्यास प्रकाशित। ‘अखंड ज्योति मासिका’ (मलयालम एडिशन) के लिए खंडशः अनुवाद। अनेकानेक लघु-कथाएँ और कविताएँ पत्र-पत्रिकाओें में प्रकाशित। संप्रति हाई स्कूल हिंदी अध्यापक पद से निवृत्त।

 

पूमातै एक खूबसूरत युवती थी। उसका जन्म ‘पूलुव’ नामक अछूत जाति में हुआ। न माता, न पिता, न कोई परिवार। वह अकेले-अकेले रहती थी।

मकरं महीने (पौष-माघ) में पेड़-पौधे तक ठर रहे थे। आम के पेड़ बौरों से भर गए थे। रात का समय। पाला-ही-पाला। पेड़ों के कोटरों में चिड़ियाँ आपस में चिपककर सो रही थीं।

तब कटलुंकरा राई भोजन करने बैठे। केले के पत्ते में पत्नी कु‌िट्ट‍त्तेई अम्मा ने गूमा फूल जैसा चावल परोसा। सालन तो एक-दो नहीं, चार प्रकार के थे। चाटने के लिए अदरक की चटनी, साथ ही अंबिया व पापड़ तथा सेंके केले के टुकड़े भी थे।

वह डकारें लेते हुए उठा, हाथ-मुँह धोया और अपनी पत्नी के दिए पान-सुपारी चबाने लगा। वह छत पर जाकर टहल रहा था, तब एक सुरीली आवाज हवा में तैरती आई और उसके कानों में जा पड़ी। वास्तव में वह आवाज हृदय को छू गई थी।

वह पूमातै थी। उसने चावल की कंजी बनाई और नाले के केकड़ों का सालन भी पकाया। खाने के बाद उसने चटाई बिछाई, फिर लेटे-लेटे गायन में रत हो गई। धीमी आवाज क्रमशः ऊँची होने लगी।

कटलुंकरा राई ने चिंडन को बुलाया। वह उसके प्रबंधक का काम करता था। उसने चिंडन से पूछा, “चिंडा, वह कौन है, जिसकी आवाज इतनी सुरीली है?”

“मालिक, वह हमारी पूमातै है, जो रबी के खेत के किनारे एक झोंपड़ी में रहती है। वह भूतों और नागों का गीत गा रही है।” चिंडन ने उत्तर दिया।

“क्या वह पूलुव परिवार की है?”

“जी हाँ, मालिक।”

“कल की कटनी में वह भी आएगी क्या?”

“जी, जरूर।”

सुनहरे रंग का धान का खेत। धान की कटनी के लिए पूलुव परिवार के नर-नारी, बच्चे-बूढ़े, सब-के-सब खेत के किनारे कतार में खड़े हो गए। उनके चेहरों पर खुशी की छवि उभर रही थी। करता खानदान एलन पूलुवन ने हँसिया लेकर पूरब की ओर घूमकर, हाथ जोड़कर प्रणाम किया। तब बाल सूर्य मुसकरा रहा था।

एलन पूलुवन ने ‘लगन कटनी’ का आरंभ किया। धान की फसल मुट्ठी भर काटकर वह छाती से लगाया। बस पूलुवों की हँसियाँ चमकने लगीं। धान की फसल का ढेर लगने लगा। पूमातै का गायन धीमें से आरंभ हुआ और धीरे-धीरे तेज होने लगा। उसके पश्चात् बाकी सब भी गा रहे थे।

पूमातै ने अपनी धोती की पूँछ कमर में खोंस ली थी। कपड़े का किनारा मुश्किल से घुटनों तक पहुँचता था। सीनावंद पसीने में लथपथ हो रहा था। तब मेंड़ पर खड़ा कटलुंकरा राई पूमातै के जोबन को ललचाई नजरों से देख रहा था। वह ओढ़नी से बार-बार काँख पोंछ रहा था। उसके मन में लड्डू फूट रहा था। ‘पूलुव नारी पूमातै के सामने मेरी पत्नी कु‌िट्ट‍त्तेई कुछ भी नहीं, कोई भी नहीं।’ वह मन में बड़बड़ाने लगा।

रात हो गई। कटलुंकरा राई को न खाना चाहिए, न पानी। उसकी नींद भी कहीं खो गई। विवश होकर उसने चिंडन को बुलाया।

“चिंडा, नींद नहीं आ रही। मन अशांत है। पूमातै को भूलना असंभव है।”

“मालिक, परेशानी छोड़ दीजिए, कोई रास्ता निकलेगा।” चिंडन ने दिलासा दिया।

“रास्ता! जाकर पूछना ही एक रास्ता है। पूमातै से पूछना चाहिए कि मैं पैदल आऊँ तो क्या झोंपड़ी की अगड़ी खोलेगी? क्या मनचाही बातें करेगी? क्या एक बार साथ लेटने की सहमति देगी?”

रातोरात चिंडन पूमातै की कुटी में पहुँचा और दरवाजा खटखटाने लगा।

“इस आधी रात में आप कौन हैं? क्या चाहिए? जानते नहीं क्या, मैं अकेली रहती हूँ? लौट जाइए! नहीं तो मैं चिल्लाकर सबको बुलाऊँगी।”

वह गुस्से और डर के मारे काँप रही थी, फिर भी किसी-न-किसी तरह उसने कहा।

“पूमातै, डरो मत, मैं चिंडन हूँ।” वह धीमे से बोला।

“आप इस समय, इधर?”

“राईजी ने तुझे आज देख था, पूमातै। तेरा गाना भी सुना था। सच कहूँ, वे तुझ पर मोहित हो गए हैं। वे पूछते हैं—पैदल आएँ तो क्या तू दरवाजा खोलेगी? मनचाही बात करेगी क्या? एक बार, कम-से-कम एक बार साथ लेटेगी क्या?” चिंडन बेशर्म होकर कह रहा था।

“चिंडनजी, कुटी में मैं अकेले रहती हूँ। रात में कोई आए तो लोग क्या कहेंगे। मेरा मान उतर जाएगा। मैं गरीब हूँ, जाति से नीच हूँ। लेकिन चिंडनजी, मान है न, मान, वह किसी को न बेचूँगी।”

“मान की बात छोड़ दे। मेरे-तेरे सिवा और किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। हाथ में आया सौभाग्य है। इसे मत ठुकरा!” चिंडन उसे ललचाने लगा।

“मैं अपने पुरखों का, कुलदेवता की कसम खाकर कहती हूँ—मैं किसी के सामने अपनी झोंपड़ी खोलूँगी नहीं। यह शरीर एक समर्पण की वस्तु है। यदि कोई पुरुष कभी मेरे पति के रूप में आए तो उनको सौंप दूँगी।” पूमातै ने साफ-साफ कह दिया।

चिंडन खाली हाथ लौट आया।

फिर एक दिन कटलुंका राई ने चिंडन से पूछा, “चिंडा, मैं स्वयं पूमातै से पूछूँ तो क्या वह हामी भरेगी?”

“मालिक, मालूम नहीं!”

एक महीना बीत गया। एक दोपहर को केवड़-वन में पूमातै पत्ते काट रही थी। अचानक न जाने कहाँ से कटलुंकरा राई वहाँ पहुँच गया। वह ललचाई नजरों से उसे ताकता रहा। उसके नसों में कुछ नशा की भाँति ऊपर-नीचे दौड़ने लगा—“री...पूमातै!”

कामांध कटलुंकरा राई की आवाज सुनकर पूमातै चौंक गई। उसकी दशा शेर के मुँह में पड़े हिरण सी हो गई!

“जलती धूप है, आराम कर, पूमातै।”

“गरमी, सर्दी, बारिश—सब हम लोगों काे पसंद है, मालिक! इसलिए आराम की आवश्यकता ही नहीं।”

“पूमातै, सुन, मेरे मन में सिर्फ तू है। तेरी छवि ने मेरी नींद चुरा ली है। सिर्फ एक बार...”

“जी नहीं, हुजूर। यह संभव नहीं। इस अछूत को छोड़ दीजिए। आप अपनी कु‌िट्ट‍त्तेई अम्मा के साथ खुशी मनाइए।”

“सोने का हार, कंकण, खेत, इमारत, क्या चाहिए? सबकुछ दूँगा मैं। मन-मुटाव छोड़ दे!”

“ये सब मान के सामने निस्सार हैं, हुजूर। यदि कोई पुरुष कभी जिंदगी में पति के रूप में आएगा तो उसके लिए मैं अपना शरीर समर्पण कर दूँगी, वह भी निर्मल मन के साथ। आप अपनी राह देखिए।”

कटलुंकरा राई गुस्से से किचकिचाया—“मैं बदला लूँगा!”

“परवाह नहीं।”

“जीते-जी जला दूँगा।”

“जला दीजिए, तो भी हामी न भरूँगी। मौत से महत्त्वपूर्ण मान है।”

लंपट कटलुंकरा राई अपने महल की ओर चल पड़ा।

सिसकती पूमातै अपनी कुटिया की ओर चली।

फिर न जाने क्यों किसी ने लौनी के लिए उसे नहीं बुलाया। बेकार हो गई। कोई मजदूरी नहीं। उसने सिर्फ गड और नाले के केकड़े खाकर अपनी भूख मिटाई। वर्षा और सर्दी चली गई। फिर गरमी आई। गाँव में चरवाहे आ पहुँचे। पुलुओं ने उनको टोकरियाँ दीं। बदले में चरवाहों ने उनको दूध दिया। इस प्रकार देवा-लेई चली। उन लोगों ने आपस में हँसी-ठट्टा किया।

महीना बीत गया। चरवाहे चौपायों को हाँकते हुए कहीं और चले गए। तब कटलुंकरा राई ने सोचा कि यही सुवर्णावसर है। वह पूमातै के विरुद्ध षड्‍‍यंत्र रचने लगा। चिंडन को आज्ञा दी कि कैतक्कुटि आयित्तिरा को बुला लाए।

चिंडन चोरी-छिपे आयित्तिरा नामक पूलुव स्त्री के पास दौड़ा गया और हाथोहाथ उसे बुला लाया। वह राई के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।

“आयित्तिरे, मुझे तेरी सहायता चाहिए!”

“फरमाइए, बदचलन मालिक!”

“तुम कुटिया में जाकर बोलना कि पूमातै बदचलन है। एक चरवाहा उसका लगवार है।”

“जी नहीं, हुजूर। जान जाने पर भी वह मान नहीं देगी। वह कुल्टा नहीं। मेरे जैसी औरत नहीं। आपको याद होंगे कि आप अपनी जवानी में कितने दिनों तक मेरी कुटी में सोए थे। लेकिन पूमातै, वह औरतों में सितारा है।” आयित्तिरा बेबाकी से बोल रही थी।

“आयित्तिरे, जो मैं कहता हूँ, वह करोगी तो मैं तुझे सोने का एक हार दूँगा। चावल जितना चाहिए, अभी ले ले। चिंडन देगा।”

उसने लाचार होकर सहमति दी।

वह अवसर तलाश पूलुवों की बस्ती में गई और कहा कि पूमातै को एक चरवाहे से अशिष्ट लगाव है।

वन-दाह की तरह यह बात सब ओर फैल गई।

एलन पूलुवन के नेतृत्व में सब कटलुंकर राई के सामने पहुँचे। एलन ने शिकायत की। हव मुँह पर हाथ दबाए बोला, “मालिक, हमारी पूमातै कुलछनी है, कुलटा है। उसे किसी चरवाहे से लगाव है। उसे उचित दंड दीजिए। नहीं तो कुलदैया रूठेगा और कुल का सर्वनाश होगा।”

“उसे हमारे सामने हाजिर करो।”

वह घसीटकर लाई गई। वह सिर पीटकर रो रही थी।

“नहीं...नहीं, मैं कुलटा नहीं। मैंने कोई कसूर नहीं किया। यह धोखा है, धोखा।”

“कोई गवाह है क्या?” राई ने पूछा।

“जी हाँ, मालिक! मैंने अपनी आँखों से देखा है।” आयित्तिरा की झूठी गवाही सुनकर कटलुंकरा राई मन-ही-मन हँस पड़ा।

उसका निर्णय सुनने के लिए सब कान दे रहे थे कि तभी कटलुंकरा राई ने हुक्‍म दिया, “पूमातै की कुटी में आग लगा दो। उसके हाथों में टूटी हुई झाड़ू और गोबर की हाँड़ी दे दो। गले में अपराध-चिह्न‍ लटका दो और गधे पर बिठाकर भँड़ौआ गाकर, रबाना बजाकर घुमाओ। फिर कुटी के हाते के आम के पेड़ से बाँध दो। साँकल से बाँधना। अगले शुक्रवार दोपहर को। मशाल से उनके बाल और स्तनों पर आग लगाओ, उस दिन हम भी पधारेंगे।”

पूमातै पिट्टस मचाने लगी, दहलने लगी। लेकिन क्या फायदा! तब भी वह चिल्ला रही थी—मेरा कोई अपराध नहीं। लेकिन वह नक्कारखाने में तूती की आवाज हो गई।

पूलुवों ने अक्षरशः आज्ञा पालन किया। अंत में उसे पेड़ से बाँध दिया। फिर सरपूलुव एलन ने मशाल तेल में डुबाेकर उसमें आग लगा दी। तब कटलुंकार राज के सभी लोग वहाँ उपस्थित थे।

“आयित्तिरे, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है? इस धोखे से तुझे क्या लाभ मिलेगा? क्या तेरा दिल लोहे या पत्थर का है?”

“चुप रह कुलच्छिनी, बदचलन।” आयित्तिरा ने सोचा, यह खड़ा जवाब है।

कटलुंकरा राई ने पूमातै के बदन को आग लगाने का इशारा किया। सरपूलुव की जलती मशाल उसके सिर और स्तनों को बार-बार जलाने लगी। इस सीनाजोरी को देखकर पेड़ों पर बैठी चिड़ियाँ भी रो पड़ीं। मशाल बुझ गई तो युद्ध जीते वीर की तरह एलन लौटा।

जले बाल व मांस की बदबू से लोगों को अपनी नाक बंद करनी पड़ी। उस नारी की चीख-पुकार से लोगों के हृदय पिघल गए। किसी ने आकर जंजीर खोल दी। पूमातै नीचे जमीन पर गिर पड़ी। सिर और उसके स्तन जले केले की तरह हो गए थे।

चारों तरफ सन्नाटा छा गया। रुलाई नहीं। हवा नहीं। चिड़ियों की चहक नहीं। फिर किसी तरह अपने विकृत शरीर को सँभालकर पूमातै उठ बैठी। उसके मुँह से ये शब्द निकले—“आयित्तिरे, भूलो मत! मैं पिशाचिनी बनकर आऊँगी, तब तुम्हारी जान ले लूँगी।”

आयित्तिरा डर गई। उसे अपनी कहनी और करनी पर बड़ा पछतावा हुआ। वह जोर से बोली, “पूमातै ने अपराध नहीं किया। मैंने झूठ कहा, झूठ। कटलुंकरा राई की आज्ञा पाकर मैंने झूठ कहा। मुझे झूठ कहना पड़ा। पूमातै, माफी...माफ!”

वह रो पड़ी। एलन रो पड़ा। सब-के-सब रो पड़े। एलन ने माफी माँगते हुए उसके लहूलुहान माथे पर अंतिम चुंबन दिया। तब आयित्तिरा मार खाकर दौड़ने लगी। कटलुंकरा राई बुत की तरह खड़ा हो गया।

पूमातै किसी प्रकार उठ खड़ी हुई। उसने तीखे स्वर में कटलुंकरा राई से पूछा, “जले सिर और जली अंठलियों से छिनारा करने आते हो, कटलुंकर राईजी?”

वह चुप रहा और आँख बचाकर निकल गया। लेकिन उसका महल जल रहा था। उसको ऐसा लगा कि आग की लपटें उसकी ओर आ रही हैं। वह पीछे मुड़कर भाग रहा था, बेतहाशा...अलक्ष्य।

पूमातै के चारों ओर खड़े लोग आँसू बहा रहे थे।

उसके होंठों से शब्द फूटे—“वे...माँ-बाप बुला रहे हैं, कुलदेवी को देख रही हूँ।...माता दुर्गा...!”

वह निकट के चौकोर कुएँ में कूद गई। सब जोर-जोर से पुकारने लगे—“पूमातै पोन्नम्मा...पूमातै पोन्नम्मा!”

लोगों का विश्वास है कि पूमातै चंडी देवी में विलीन हो गई। तब से पूलुव लोग उनकी पूजा करने लगे।

चेलन्नूर, कोषिकोड

केरल-६७३६१६

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